दुनिया के सबसे ख़तरनाक लड़ाकू विमान उड़ाने वाले इस पायलट की ज़िंदगी साहस की अद्भुत मिसाल है
दुनिया के सबसे ख़तरनाक लड़ाकू विमान उड़ाने वाले इस पायलट की ज़िंदगी साहस की अद्भुत मिसाल है
दुनिया के सबसे ख़तरनाक लड़ाकू विमान उड़ाने वाले इस पायलट की ज़िंदगी साहस की अद्भुत मिसाल है

मिग-21. एक ऐसा लड़ाकू विमान जो पिछले 50 सालों से भारतीय एयर फोर्स की रीढ़ की हड्डी बना हुआ है. वो विमान जिसकी मदद से भारत ने 1971 से लेकर कारगिल युद्ध जीत लेने में कामयाबी हासिल की. मगर दुनिया भर में एक किफ़ायती फ़ाइटर प्लेन के रूप में अपनी जगह बनाने वाला ये विमान, दुर्भाग्य से पिछले कुछ सालों में ‘उड़ते कफ़न’ यानि Flying Coffin के तौर पर जाना जाने लगा है.

2012 में पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी के एक बयान के अनुसार, पिछले 40 सालों में 872 मिग विमानों में से 482 क्षतिग्रस्त हुए हैं. इन हादसों में 170 से ज़्यादा पायलटों और 39 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है. ज़ाहिर है, इन हादसों ने मिग की प्रतिष्ठा को ठेस तो पहुंचाई ही है, मीडिया में भी इस विमान को लेकर खास सकारात्मक राय नहीं है. ऐसे में एयर कमांडर सुरेंद्र सिंह त्यागी, इस मिथक को तोड़ने में कामयाब रहे हैं.

एयर कमांडर सुरेंद्र सिंह त्यागी, न केवल विवादास्पद मिग 21 बल्कि मिग 23, 27, 29, जैगुआर और कैनबेरा जैसे लड़ाकू विमानों को भी उड़ा चुके हैं.

दुनिया के सबसे ख़तरनाक लड़ाकू विमान उड़ाने वाले इस पायलट की ज़िंदगी साहस की अद्भुत मिसाल है
दुनिया के सबसे ख़तरनाक लड़ाकू विमान उड़ाने वाले इस पायलट की ज़िंदगी साहस की अद्भुत मिसाल है

33 साल के अपने शानदार करियर में त्यागी ने 8000 घंटों की फ्लाइंग की है. इनमें से 4003 घंटे तो उन्होंने मिग विमानों को ही उड़ाया है. अगर इन फ्लाइट्स के घंटों को दिनों में तब्दील किया जाए तो त्यागी ने कुल 333 दिन फ्लाइंग की हैं जिसमें से 167 दिन तो उन्होंने फाइटर प्लेन चलाते हुए ही बिताए हैं. त्यागी का अपने मिग 21 विमान के साथ लगाव ऐसा है कि वे एक विमान में सबसे ज़्यादा समय बिताने का रिकॉर्ड भी बना चुके हैं.

त्यागी के अनुसार, मिग 21 को चलाना बहुत जटिल भी नहीं है लेकिन ये आपसे दक्षतापूर्ण होने की उम्मीद रखता है. ये एक ऐसा विमान है जिसमें आप अपनी क्षमताओं की ऊंचाईयों को छू सकते हैं. रूस के इंजीनियरों ने इसे पायलटों को कंफ़र्ट जोन से बाहर निकलने के लिए ही बनाया है. हालांकि इसे चलाते वक्त सतर्कता बरतनी भी जरूरी है.

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त्यागी ने कहा कि विकसित देशों में पायलट जब भी मुसीबत में होते हैं, तो वे विमान से उतरने में एक पल भी नहीं लगाते, वहां विमान के क्रैश होने की स्थिति में सरकार इस बात की ज़्यादा परवाह नहीं करती. किसी भी तकनीकी खराबी आने पर पायलट अपनी जान को सबसे पहले अहमियत देता है. वहीं भारत में पायलट विमान को बचाने की पूरी कोशिश करता है, इसी के चलते वे अहम समय गंवा देते हैं और इस वजह से कई बार उनकी जान पर भी बन आती है.

उन्होंने कहा कि भारत का पर्यावरण, लड़ाकू विमानों के हिसाब से बेहद सख्त है. कई बार रौशनी और पक्षियों के चलते भी बेहद परेशानियों का सामना करना पड़ता है. ज़्यादातर मामलों में पायलटों की गलती कम और बाहरी फैक्टर्स की गलती ज़्यादा होती है.