दूसरों की गंदगी साफ़ करने वालों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता है. आखिर किस मिट्टी के बने हैं हम?
दूसरों की गंदगी साफ़ करने वालों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता है. आखिर किस मिट्टी के बने हैं हम?
दूसरों की गंदगी साफ़ करने वालों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता है. आखिर किस मिट्टी के बने हैं हम?

हमारे समाज का बारीकी से विश्लेषण करने पर कितने ही मुद्दे ऐसे निकल आते हैं, जिन पर हमें बात करने में ही कोफ़्त होती है. इनसे जुड़े सवाल से हम परेशान और असहज महसूस करते हैं. या तो इन पर खुल कर चर्चा नहीं होती, या फिर इन्हें अनदेखा ही कर दिया जाता है.

ऐसा ही एक मुद्दा है जाति का. ये सभी जानते हैं कि भारत में अगर आप किसी उच्च जाति से ताल्लुक रखते हैं, तो आपकी ज़िंदगी में कई परेशानियां तो वैसे ही कम हो जाती हैं. मेहनत के बाद एक अच्छी नौकरी पा लेना आपको भले ही अपनी उपलब्धि लगे, लेकिन इस बात में भी कोई दो राय नहीं कि ऊंची जाति से जुड़े कई सामाजिक फ़ैक्टर्स भी आपकी मदद करते हैं. मुश्किल परिस्थितियों में आपको दुत्कारा नहीं जाता है, लाइफ़ में आप कुछ खास न कर रहे हों, तब भी आपकी इज्ज़त बराबर बनी रहती है. संघर्ष कर रहे हो तो समाज आपकी मदद के लिए भी तैयार रहता है. कहने का मतलब है कि ऊंची जाति के होने से कई ऐसे फ़ायदे हैं, जिन्हें आप चाह कर भी नकार नहीं सकते हैं.

दूसरों की गंदगी साफ़ करने वालों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता है. आखिर किस मिट्टी के बने हैं हम?
दूसरों की गंदगी साफ़ करने वालों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता है. आखिर किस मिट्टी के बने हैं हम?

वहीं, इस देश में किसी नीची जाति का होना किसी कड़े संघर्ष से कम नहीं होता. स्कूल से लेकर ऑफ़िस तक आपको हर तरीके के भेदभाव से रूबरू होना पड़ सकता है और जो स्कूल पहुंच ही नहीं पाते, उनमें से कई लोग नारकीय जीवन बिताने को मजबूर होते हैं. उन्हें ऐसे-ऐसे काम करने पड़ते हैं, जिन्हें आप सपने में भी नहीं सोचना चाहेंगे.

राह चलते अगर हमारे जूते या चप्पलों पर थोड़ी-सी भी गंदगी लग जाए, तो हम नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं, इन्हें फ़ौरन धोने या हटाने की कोशिश करते हैं. लेकिन हर साल इस गंदगी में घुसकर हज़ारों सीवर कर्मचारी मौत के मुंह में समा जाते हैं और हमें रत्ती भर भी फ़र्क नहीं पड़ता. मेनहोल में गिरने से लोगों की मौत की खबरें अक्सर हमारे अखबारों की शोभा बढ़ा रही होती हैं, लेकिन चाय की घूंट लेते हुए हम इन खबरों को पूरा पढ़ने तक की ज़हमत नहीं उठाते.

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एक सर्वे के अनुसार, भारत में हर साल लगभग बीस हज़ार लोगों की सीवर या सेप्टिक टैंक में जाने से मौत हो जाती है. ये बॉर्डर पर मरने वाले सैनिकों की संख्या से कई गुना ज़्यादा है. सैनिकों को कम से कम मान सम्मान की नज़रों से तो देखा जाता है, पर इन सीवर कर्मचारियों को सम्मान तो दूर, एक साधारण इंसान तक नहीं समझा जाता. ये बात बहुत लोगों को बुरी लगेगी, लेकिन सच्चाई ये है कि जान दोनों दे रहे हैं, अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए. तो दोनों का ही सम्मान ज़रूरी नहीं?

दूसरों की गंदगी साफ़ करने वालों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता है. आखिर किस मिट्टी के बने हैं हम?
दूसरों की गंदगी साफ़ करने वालों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता है. आखिर किस मिट्टी के बने हैं हम?

ज़ाहिर है, हम संवेदनहीन हैं, तभी शायद सरकार भी संवेदनहीन बनी हुई है. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के अनुसार, 1993 के बाद से इन सीवर कर्मचारियों की मौतों पर उनके परिजनों को 10 लाख रुपये मिलने चाहिए थे, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारों ने इन मामले को लेकर कोई पहल नहीं दिखाई और मुआवज़े की ये प्रक्रिया गरीब औऱ अशिक्षित लोगों के लिए बेहद जटिल बनी हुई है.

दुनिया के विकसित देशों में मेनहोल में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए विशेष सूट का निर्माण होता है, ताकि गंदे पानी से उनका संपर्क न हो. मेनहोल में घुसते वक्त ऑक्सीजन की कमी न महसूस हो, इसके लिए खास उपकरण का भी इंतजाम होता है. इसके अलावा सीवरों में ऑक्सीजन की कमी के लिए भी खास प्रयास किए जाते हैं. हॉन्ग-कॉन्ग में किसी भी सीवर कर्मचारी को 15 लाइसेंस और विशेष ट्रेनिंग लेने के बाद ही मेनहोल में घुसने की इजाज़त मिलती है.

दूसरों की गंदगी साफ़ करने वालों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता है. आखिर किस मिट्टी के बने हैं हम?
दूसरों की गंदगी साफ़ करने वालों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता है. आखिर किस मिट्टी के बने हैं हम?

लेकिन हमारे देश में लगभग सभी सीवर कर्मचारी बिना किसी प्रोटेक्शन के मेनहोल में घुसते हैं. गंदगी के चलते इन सीवरों में अमोनिया, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फ़र डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फ़ाइड जैसी ज़हरीली गैसें मौजूद होती हैं और ऑक्सीजन की भारी कमी होती है. यही कारण है कि सावधानी बरतने के बावजूद सैंकड़ों सीवर कर्मचारी इन ज़हरीली गैसों की चपेट में आकर अपनी जान गंवा बैठते हैं.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, सफ़ाई कर्मचारियों के लिए बनाई गई सेफ़्टी बेल्ट उन्हें किसी तरह की सेफ़्टी नहीं देती. जिन लोगों ने भी इन सेफ़्टी बेल्ट्स को पहना, उनमें से ज़्यादातर चोटिल हो गए. गंभीर बीमारियों से जूझने और मेनहोल में अपने ही साथियों की दर्दनाक मौत की कहानियां सुनने के बाद भी ये लोग इस काम को करने के लिए मजबूर हैं. ज़्यादातर सफ़ाई कर्मचारी पारंपरिक वाल्मीकि दलित होते हैं, वे निम्न वर्ग से आते हैं और ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं होते.

दूसरों की गंदगी साफ़ करने वालों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता है. आखिर किस मिट्टी के बने हैं हम?
दूसरों की गंदगी साफ़ करने वालों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता है. आखिर किस मिट्टी के बने हैं हम?

पेट पालने के लिए उन्हें अपनी जान जोखिम में डाल कर खतरनाक सेप्टिक टैंक या सीवर में उतरना पड़ता है. मरने वालों के परिवारों की स्थिति कितनी दयनीय होती है, इसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है. इन लोगों के परिवारवाले ज़िन्दा रहने के लिए कैसे संघर्ष करते हैं और कैसे इन लोगों को अत्यधिक गरीबी के चलते भयानक हालातों से गुज़रना पड़ता है, ऐसी कई रूह कंपा देने वाली कहानियां बहुत बार सामने आई हैं.

दूसरों की गंदगी साफ़ करने वालों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता है. आखिर किस मिट्टी के बने हैं हम?
दूसरों की गंदगी साफ़ करने वालों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता है. आखिर किस मिट्टी के बने हैं हम?

दुनिया भर की गंदगी में अपने आप को झोंक देने वाले ये सीवर कर्मचारी जब रात को घर लौटते हैं, तो शराब के नशे में सब कुछ भुलाने की कोशिश करते हैं. ये लोग भारत की सामाजिक संरचना में सबसे निचले पायदान पर आते हैं, कई क्षेत्रों में दलित भी इन्हें अछूत मानते हैं. नशे में इन लोगों की Frustration का शिकार आखिरकार बच्चों और पत्नियों को होना पड़ता है. देश की हरिजन बस्तियों में शराब से जुड़ी हिंसा भी इसलिए आम होती हैं. शराब और चुनौतीपूर्ण कार्य के कारण ही इन लोगों की औसत ज़िंदगी घटकर 45 के आस-पास पहुंच जाती है, जो सामान्य लोगों के मुकाबले 25 साल कम है. 80 प्रतिशत कर्मचारी 60 साल की उम्र से पहले ही दुनिया को अलविदा कह देते हैं.

स्वच्छ भारत अभियान का दम भरने वाली केंद्र सरकार भी इस मुद्दे पर संवदेनहीन बनी हुई है. सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन के नेता बेजवाड़ा विल्सन ने इस मामले में एक बार कहा था कि, ‘ये मौत नहीं, हत्याएं हैं. कोई स्वच्छ भारत अभियान इस जातिगत गंदगी को साफ़ करने को तैयार नहीं है. वे इस पूरे ढांचे को यूं ही बनाए रखना चाहते हैं. हमारा एक ही सवाल है कि ये हत्याएं कब बंद होंगी और इन लोगों को कब न्याय मिलेगा?’

दूसरों की गंदगी साफ़ करने वालों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता है. आखिर किस मिट्टी के बने हैं हम?
दूसरों की गंदगी साफ़ करने वालों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता है. आखिर किस मिट्टी के बने हैं हम?

सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2013 में एक कानून लागू किया था, जिसके मुताबिक सीवर या सेप्टिक टैंक को साफ़ करने के लिए किसी भी इंसान का इन सीवरों में उतरना अब पूरी तरह से प्रतिबंधित होगा. इस कानून के बनने के चार साल बाद सभी जगह इसकी जमकर अवहेलना हो रही है. यही नहीं, इन मौतों को रोकने के लिए केंद्र सरकार को सैनिटेशन को आधुनिक करने की दिशा में जो कदम उठाने चाहिए थे, वे कहीं से भी उनके एजेंडे में दिखाई नहीं दे रहे हैं.

स्मार्ट सिटी की जगह स्मार्ट सैनिटेशन पर ज़्यादा फ़ोकस होना चाहिए. सीवर सिस्टम को आधुनिक करना भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए. सैनिटेशन को जब तक जाति आधारित पेशे से मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक सफ़ाई कर्मचारियों की मुक्ति नहीं होगी. एक जाति विशेष के लोग हर साल सीवरों में घुस कर मौत के मुंह में समा रहे हैं, और समाज के सबसे वंचित और हाशिए पर पड़े इस तबके के लिए, केंद्र और राज्य सरकारों के प्रयास नाकाफ़ी साबित हो रहे हैं.

समाज के इसी दुत्कार दिए गए तबके पर चेज़ की टीम ने एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाई है. इस फ़िल्म में एक शख़्स मुंबई के इन सीवर कर्मचारियों की दिनचर्या को फॉलो करने की कोशिश करता है और उसकी इस जद्दोजहद को देखते ही रोंगटे खड़े होने लगते है. फ़िल्म में ये भी दिखाया गया है कि कैसे लगातार प्रयासों के बावजूद प्रशासन पूरे मामले में लापरवाही बरतता है और समाज के इस वर्ग के प्रति सरकार एकदम संवेदनहीन साबित होती है. फ़िल्म देखिए और खुद ही फैसला कीजिए कि 21वीं सदी में भी इन लोगों को मिल रहा ये नारकीय जीवन कहां तक जायज़ है?